बुधवार, 6 फ़रवरी 2013


हिन्दुत्व का कलंक मनुस्मृति- जातिमुक्त भारत हेतु- 2



मेरा उद्देश्य 
1- हर हिन्दू अपने नाम के आगे से जातिसूचक शव्द हटाकर गुण बाचक शब्द लगाये !
2-कोई किसी की जात ना पूछे ना बताये !
3-जातीबाद को खतम करवाने हेतु सरकार पर कानून बदलकर जातीबाद पर पूर्ण बैन लगाने हेतु दवाव बनाने हेतु हिन्दू एकता के लिए समाज को जागरूक करना 
4-जातीबाद-गॉत्रबाद महा पाखंड और अंधविस्वास इनपर तुरंत रोक हेतु सरकार पर दबाब बने 
5-जो संगठन जातीबाद और गोत्र जैसे पाखंड के नाम पर बच्चो का कतल करबाते हैं उनेह तुरंत आतंकी संघटन घोषित करके उसमे काम करने बालों को को जेल मे डाला जाये ताकि एह अमानवीय आतंक समाप्त हो सके.
6-आज तक सिर्फ प्रेमी ही इसका विरोध करते रहे हैं पर अब समय आ गया है जब पूरा समाज मिलकर इस कलंक के खिलाफ खड़ा हो .
7-आर्य समाज,संघ,अन्य ध्रमिक संघटन और अग्नि वीर जैसी साइटें भी इस गोत्र और जातीबाद का घोर विरोध करें और समाज को जागरूक करें ना की वर्ण वियावस्था का समर्थन .
8-में किसी जाती या वर्ग का विरोध नही कर रहा हूँ में पूरे सिस्टम का विरोध कर रहा हूँ 
9-हिन्दू,हिन्दुस्तान की एकता और अखंडता के लिए परम अबस्यक है 
10-नारी जाती को पूर्ण स्व्न्त्र्ता हो कुछ भी करने को,अपने फैसले लेने के लिए .
 Note : वेद ही सर्वोपरि हैं

बाबा साहव अम्बेडकर ने कहा है की जो अपना इतिहास नही पड़ते और समझते है वो कभी इतिहास नही बना सकते है

कौटिल्य चाडक्य जी ने कहा है ,अपने जीवन मे कुछ करना चाहते हो तो दूसरो के जीवन और इतिहास से सीखो किओंकी तुमे खुद अपने जीवन से सीखने के लिए जिंदगी बहुत कम पड जायेगी और सीखते ही रह जाओगे कुछ नही क्र पाओगे .

जो लोग कहते हैं की भेद-भाव सामान्य बात है तो जान लें की भेद-भाव सामान्य बात नही है शारुख ख़ान जिसके अरवों फैन है और करोड़ो रुपये शायद रोज़ कमाता हो जब इस भेद-भाव से टूट कर सारे आम अपने दुख का बयान करता है तो एक आम की क्या औकाद है इस भेद-भाव को सहेन करने की

बिस्व का सबसे महान और सहेन शील,दान वीर कर्ण भी इसी भेद-भाव से आहत होकर दुखी मन से कुछ गलत बोल गये थे तो आम आदमी क्या है

"" लकच्य भेद को चले कर्ण तब कड़क द्रोप्ती बोली
साबधान् मत आगे बॅडना होनी थी जो होली ,
सूत पुत्र के साथ ना मेरा गठ बन्धन हो सकता
छत्त्राडि का प्रेम ना अपने गौरव को खो सकता ""  karn khand kavya
द्रोप्ती ने जातीबाद के कारण अपने प्रेम को ठुकरा दिया और पांच मूर्ख पांडवों की पत्नी (वैस्या) बन गई किओंकी वेदों मे पांच पति बाली औरत को वैस्या कहा गया है

इसी प्रतिकार कार के कारण कर्ण के मुख से एह अबसबद निकले थे

""दुशासन मत ठहर वस्त्र हर ले किर्सना के सारे
बह पुकार ले रो 2 कर चाहे बह जिसे पुकारे ""    Karan khand kavya


आज ख़ान के मुख से वेदना सामने आना एक सामान्य सी बात नही है बल्कि दिल का दर्द है

किसी एक की गलती की सज़ा पूरी कौम को नही दी जा सकती है पूरी कौम के साथ नफरत बाली बातें क्यू होती है


सचाई छिप नहीं सकती बनावट के उसूलों से,
कि खुशबू आ नहीं सकती कभी कागज के फूलों से॥
आज कल वर्ण व्यवस्था के ठेकेदारों ने चा�����ों तरफ शर्मा वर्मा की धूम मचा रक्खी ह���। आधार के लिए वही स्वामी जी का भ्रमोत्पादक लेख पेश कर दिया जाता है। परन्तु यह काम अब पोची दलीलों से पूर्ण नहीं हो सकता है। शर्मा वर्मा की सिद्धि के लिए वेद, इतिहास और पुराणों के प्रमाणों को प्रस्तुत करना पड़ेगा। कहा भी है-‘‘इतिहास पुराणाभ्यां वैदार्थ उपवृंहयेत्’’ इसलिए इतिहास पुराण को सर्व प्रथम लीजिए। महाभारत तक इतिहास और पुराण इस बात की साक्षी नहीं देते हैं कि किसी भी ऋषि मुनि ने या ब्रह्मर्षि राजर्षि ने अपने नाम के साथ वर्ण व्यवस्था का प्रकाश करने के लिए शर्मा वर्मा का प्रयोग किया हो। सृष्टि के आदि में जिन चार ऋषियों पर वेद प्रकट हुए-वे भी कोरे अग्नि, वायु, आदित्य और अङ्गिरा कहलाए। अग्निशर्मा, वायुवर्मा, आदित्यगुप्त और अङ्गिरादास का प्रयोग आज तक सुना या देखा नहीं गया। गौतम कपिल कणाद शर्मा नहीं लिखते थे। राजा अश्वपति, जनक और राम वर्मा नहीं लिखते थे। कहीं रामायण में राम वर्मा या हनुमान वर्मा की चर्चा नहीं। हाँ! महाभारत में कृतवर्मा और महाभाष्य में इन्द्रवर्मा मिलता है सो भी समस्त नामों में वर्मा वर्ण व्यवस्था का द्योतक नहीं अपितु वह नाम ही हो जाता है। आज जैसे श्रीकृष्ण में श्री, रामजीलाल में जी और भगवानदास में भगवान नाम ही हैं। जब इतिहास और पुराण से शर्मा वर्मा पुष्ट नहीं हुवे तो फिर वेदों में इनका पता पाना आकाश के फूलों और बन्ध्या के पुत्रों के समान असम्भव है। चारों वेदों में कहीं ‘शर्मा’ शब्द नहीं आया है। हमने कई बार पोप पण्डितों को चैलेंज दिया कि कोई भी चारों वेदों में शर्मा शब्द दिखलावे। इस पर कई पण्डितम्मन्यों ने बृथा प्रयास भी किया कि वेदों में शर्मा शब्द है, क्यों कि ‘शर्म में यच्छ’ ऐसा अनेक स्थानों पर वेद में आया है। इन बेचारों को पता नहीं कि ‘शर्म’ नपुंसक लिंगी है। हम पुलिंग वाची शर्मा शब्द के लिए चैलेंज देते ���������ैं। तब ‘सुशर्मा’ दिखा दिया। जैसे रोटी माँगी तो डबल रोटी ले आए। फिर बात तो वही रही। यहाँ भी वही भूल करते हैं। सुशर्मा में भी सु-शर्म है। हमारा तो चैलेंज यह है ‘शर्मा’ शब्द पुलिंग वाची स्वतन्त्र रूप से चारों वेदों में कहीं नहीं। जब वेदों में शर्मा शब्द ही नहीं तो वेचारी वर्ण व्यवस्था को इस शब्द से कैसे पुष्टि मिल सकती है इसलिए नामों के साथ शर्मा शब्द स्वतन्त्र रूप से प्रयोग नहीं हो सकता। जैसे-क्षेत्रपाल शर्मा, ठाकुरदत्त शर्मा और देवेन्द्रनाथ शर्मा। हाँ! देवशर्मा, विष्णुशर्मा और भद्रशर्मा नाम ठीक हैं; क्योंकि इन नामों में शर्मा शब्द नहीं हैं ‘शर्म’ है और संस्कृत व्याकरण के नियमानुसार दीर्घ होकर शर्मा बन गया है। ऐसे ही नामों के लिए महा पण्डित स्वामी दयानन्द जो ने गौणरूप से आज्ञा दी है परन्तु यहाँ तो मनचले स्वार्थी लोग रणछोड़दास शर्मा, शेरसिंह शर्मा (डबल शेर) कूड़ामल वर्मा (डबल कूड़ा) घीसूलाल गुप्ता आदि बने हुए हैं।
एक और बड़े मजे की बात-एक विकट शास्त्री कोरी संस्कृत बोलते हुए मैसूर से सीधे हमारे पास पहुँचे। कहने लगे कि हम वेदों में ‘शर्मा’ शब्द दिखायेंगे। मैंने कहा दिखाइए। बोले ‘शर्मासि मे शर्म यच्छ’ में शर्मा + असि है। मैंने कहा कि शर्म + असि है। बोले नहीं; क्योंकि शर्मन् + असि था और न का लोप असिद्ध होगा। अतः दीर्घ न हो सकेगा। इसलिए ‘शर्मा असि’ ऐसा ही मानना पड़ेगा। हमने झट उससे अगला सूत्र बता दिया कि ‘न लोपः सुप्स्वर संज्ञा तुग् विधिषु कृति’ बस चुप हो गए। प्रयोजन यह है किसी भी प्रकार ‘शर्मा’ शब्द वेदों में दिखाने के लिए वेद मंत्रों के नाक कान मरोड़ने का भी प्रयत्न करने में ये मनचले नहीं चूकते। फिर भला शर्मा बूट हाउस, शर्मा टेलरिंग हाउस और शर्मा वा�������� कम्पनी लिखने में अज्ञों को क्यों संको�� होवे? ‘शर्मा होटल’ तो एक जन्म सिद्ध अधिकार ही माना जाता है।
इन बेचारों को यह तो पता ही नहीं कि शर्मा शब्द का अर्थ हिंसक (मारने वाला) है। ये लोग धातुपाठ तो पढ़े ही नहीं-नहीं तो पोप पण्डितों के पाखण्ड में क्यों पड़ते? ‘शर्मा’ शब्द की सिद्धि के लिए आज तक कोई भी पण्डित ‘शृहिंसायाम्’ के सिवाए दूसरी धातु नहीं खोज सका। ‘शर्मा’ शब्द शृहिंसायाम् से बना है। स्वामी दयानन्द ने स्वयं लिख दिया है कि-
‘सुष्ट शृणाति इति सुशर्मा राजा विशेषतः’ अर्थात् जो भली प्रकार दुष्टों को दण्ड दे (मारे) वही सुशर्मा राजा है। यहाँ सुशर्मा ब्राह्मण नहीं है। क्षत्रिय है-तब शर्मा ब्राह्मण वाची क्यों होगा? इसी प्रकार यजु. 8/8 में स्वामी दयानन्द ने सुशर्मा का अर्थ किया है कि-
‘सुष्ठु शोभनं शर्म गृहं यस्य स सुशर्मा’ अर्थात्-जिसका घर अच्छा बना हो वह ‘सुशर्मा’ हुआ। अब सोचिए घर किसका अच्छा बना हो सकता है। क्या वैश्य ‘सुशर्मा’ नहीं कहला सकता है? अवश्य-तो फिर ‘शर्मा’ ब्राह्मणवाची कैसे हुवा!!! नहीं हो सकता।
कई लोग ‘सुशर्मा’ में मनिन् प्रत्यय सिद्ध किया करते हैं। यहाँ अब हम यह एक बार ही बता देना चाहते हैं कि ‘सुशर्मा’ में मनिन् प्रत्यय नहीं है। प्रत्युत ‘मुनिः’ प्रत्यय है। यह सूक्ष्म भेद है-परन्तु पोप पण्डितों की पण्डिताई का परिचय कराने के लिए यहाँ हम लिखते हैं। औणादिक सूत्र है।
‘मिथुनेमनिः’ इससे सुशर्मा, सुधर्मा, सुकर्मा में ‘मनिः’ प्रत्यय होता है। स्वामी दयानन्द ने स्वयं लिखा है-
यत्रोपसर्गों धातु क्रियया सम्बद्धस्तत् मिथुनम्। तस्मिन् सति उक्तेभ्यो वक्ष्यमाणेभ्यश्च धातुभ्यः मनिः प्रत्ययः स्यात्। न तु मनिन्। स्वरभेदार्थों नियमः।
जब स्वामी दयानन्द ने भ�� स���प���्��� लिख दिया कि ‘मनिन्’ प्रत्यय नहीं है-तो आज तक ‘सुशर्मा’ में ‘मनिन्’ प्रत्यय लिखने वाले परास्त हो गए। यहाँ इतने शब्द लिखने का प्रयोजन यही है कि यदि पाण्डित्य का अभिमान हो तो उसके लिए भी हम सदैव सन्नद्ध हैं। हम तो कहते हैं कि-
नखानां पण्डित्यं प्रकटयतु कस्मिन् धृतमतिः॥
एक बात विचारणीय और है-वह यह कि ‘शर्मा’ शब्द का प्रयोग किया भी कैसे जावे यदि स्वयं अपने गुण कर्मों का निश्चय प्रत्येक करने लगे तो व्यवस्था न रहेगी और दूसरी कोई सभा या समिति यह अधिकार नहीं रखती कि ‘शर्मा वर्मा’ की उपाधियाँ दे और यदि देवे भी तो बिना राज्य सत्ता के कौन स्वीकार करे कराएगा। हाँ! जन्मना ब्राह्मण शर्मा बने रहे और क्षत्रिय वर्मा तो फिर प्रचलित वर्ण व्यवस्था (जात-पाँत) का महान रोग सताये बिना नहीं रहेगा। यह हो ही रहा है। आर्यसमाज में भी यही हो रहा है। एक लखपती भी शर्मा है। एक व्यापारी भी शर्मा है, एक होटल धारी भी शर्मा है, एक सट्टेबाज दलाल भी शर्मा है। फलतः नाई शर्मा, खाती शर्मा, लोहार शर्मा भी सिद्ध हो चुके हैं। इनका यह ‘होलसेल’ शर्मा एक बड़ा भद्दा मजाक हो रहा है। इसलिए इस शर्मा वर्मा का प्रपंच मनुस्मृति से ही प्रारम्भ हुआ है। यद्यपि ‘शर्मवत् ब्राह्मणस्य स्यात्’ ऐसा ही मनुस्मृति में है। जिसका अर्थ यह होता है कि मंगलवाची नाम ब्राह्मण का होना चाहिए। जैसी कि वेद में आशा है कि ‘शिवोनामासि’ अर्थात् हे उपदेशक! (ब्राह्मण) तेरा नाम शिव है। तो भी लोगों ने वेद विरुद्ध शिवशर्मा बना दिया है। भला इस डबल कल्याण से क्या प्रयोजन!!! शिव का अर्थ भी कल्याण और शर्मा भी इनके मत में कल्याणवाची है। देखिए-
शर्मवत् ब्राह्मणस्य स्यात् राज्ञो रक्षा समन्वितम्।
वैश्यस्य ��न ���ं���ुक्तं, शूद्रस्य तु जुगुप्सितम्॥
यह मनुस्मृति का श्लोक ही मनुष्य समाज में विषमता फैलाए है और विशेषरूप से शूद्रों को दलित और अछूत बनाये है। मनुस्मृति ने इस श्लोक द्वारा आज्ञा दी है कि शूद्र का नाम बड़ा घृणित रखना चाहिए। जैसे घसीटाराम, कूड़ाराम, कूड़ामल (डबल कूड़ा) गरीबदास इत्यादि। शूद्र को ‘दास’ बनाने वाली इस मनुस्मृति के विरुद्ध जितना भी आन्दोलन किया जावे कम है। खेद तो तब होता है जब हम स्वामी दयानन्द के लेखों में भी देवदास आदि नाम पाते हैं यद्यपि स्वामी जी ने टिप्पणी में लिख दिया है कि दास वाले नाम निषिद्ध हैं-तो भी मूल में ऐसे भ्रमोत्पादक लेख का पाया जाना, उन जैसे आदर्श सुधारक के लिए शोभा नहीं देता। यदि स्वामी जी यह लेख न लिखते तो शायद आज आर्यसमाज में से वर्ण व्यवस्था की मुसीबत को मिटाने में हम लोगों को इतना भगीरथ-प्रयास न करना पड़ता। वास्तव में वह लेख है गौण रूप में-तो भी स्वार्थी लोग मुख्य रूप से उसको ग्रहण करते हैं और वर्ण व्यवस्था का बोझा आर्यसमाज पर बुरी तरह लादना चाहते हैं। हमारी सम्मति में तो शर्मा और वर्मा बिलकुल भद्दे और बेहूदे शब्द हैं। इनका बहिष्कार सबको मिल कर करना चाहिए। नहीं तो शनैः-शनैः यह ‘शर्मा’ का शोर जोर पकड़ जाएगा और भारतवासियों में लगभग आधे लोग शर्मा (हिंसक) बन जायेंगे। शर्मा के सम्बन्ध में अब हम यह भी बता देना चाहते हैं कि यह शर्मा शब्द का प्रयोग बौद्ध काल में प्रारम्भ हुआ है। बौद्धकाल के प्रारम्भ में भारत के ब्राह्मण यज्ञों में पशुओं का बलिदान खूब किया करते थे। भगवान् बुद्ध ने जब ऐसे कराल काल में ‘अहिंसा परमो धर्मः’ का प्रचार किया-तब भी ये लोग जिह्वा के वशीभूत होकर मांस खाने के लिए यज्ञों में पशुबध करते ही रहे। उन्हीं दिनों अन्य श्रेष्ठ ब्राह्मणों ने इन हिंसक ब्राह्मणों का नाम छेड़ के तौर पर ‘शर्मा’ रख दिया; क्योंकि शर्मा शब्द का अर्थ हिंसक भी हो��ा है��� इस ��्रकार न तो इतिहास शर्मा का साथ देता है और न पुराण और नाँहीं कहीं वेदों में इस का पता पाया गया। फिर न जाने यह एक आफ़त किधर से आकर भारतीयों के गले पड़ गई। इस शब्द का प्रयोग पहले कम होता था-परन्तु स्वामी दयानन्द के आन्दोलन के बाद लोगों ने अन्य सब शब्दों का परित्याग कर के परिमार्जित परिपाटी के अनुसार शर्मा-वर्मा लिखना शुरू कर दिया। अब इस का इतना अधिक दुरुपयोग हो रहा है कि शर्मा की मट्टी पलीद हो गई है। शायद यह हमारी समझ में आ भी जाता, यदि जन्ममूलक जात-पाँत के आधार पर इन शब्दों का प्रयोग न होता-परन्तु हुआ वही जो अन्य शब्दों के साथ था। जन्ममूलक ही शर्मा वर्मा बन बैठे। इसलिए ये निकम्मे शब्द अब हमारे किसी काम के नहीं रहे। इन से हमारा जितना शीघ्र पिंड छूटे उतना ही शीघ्र कल्याण हो जावे। भगवान् भारत की भँवरों को भरपूर रखने के लिए भारतीयों को इन भ्रम की भँवरों से शीघ्र निकाल देवे।
इस सम्बन्ध में अखिल भारतीय श्रद्धानन्द-दल, देहरादून के विद्वान् दलपति श्री पं. धर्मदेव जी शास्त्री सांख्य-योग-वेदांततीर्थ, दर्शनकेसरी का लेख भी हम उद्धृत करते हैं-ताकि आर्यजनता उक्त प्रशंसित पंडित जी के विचारों से लाभान्वित हो सके।
‘‘आर्यसमाज की सर्वतोमुखी प्रवृत्ति को रोकने को कारण जन्ममूलक वर्ण व्यवस्था (जात-पाँत) है। अतः उसे स्वयं तोड़ना तथा दूसरों को तोड़ने की प्रेरणा करना तथा भविष्य में अपने तथा अपने सम्बन्धियों का विवाह जन्ममूलक जात-पाँत को उपेक्षापूर्वक ही करना चाहिए। यहाँ इस बात का निर्देश करना भी अनुचित न होगा कि वर्तमान शर्मा, वर्मा, गुप्त आदि उपाधियाँ तथा वाजपेयी, शुक्ल, सिन्हा, पाठक, सेठ, सेठी आदि उप-उपाधियाँ भी जन्ममूलक जात-पाँत की पोषक हैं। अतः इनका प्रयोग करना उचित नहीं। साथ ही ��ब त��� ब्राह्मणादि न होने पर भी शर्मा आदि उपाधियाँ लगा��े वाले को हम नियमानुसार प्रयोग न करने पर बाधित नहीं कर सकते अथवा छीन नहीं सकते तब तक इनका प्रयोग और अप्रयोग बराबर है। जो आर्य लोग जन्ममूलक जातियों को महत्त्व नहीं देते उन्हें भी लोक संग्रह का विचार करके सेठ, सेठी, बाजपेयी आदि उपाधियाँ त्याग देनी चाहिए; क्योंकि इन से जन्म की भावनाओं को पुष्टि मिलती है।

Kanauj, which is traditionaly said to be derived from Kanya-Kubja (the Croocked maiden) has given its name to an important division of Brahmans in northern India.
- (इन्साइक्लोपीडिया)
कान्यकुब्ज, गौड़, वाजपेयी विवेचन
वर्ण व्यवस्था के समर्थकों का एक यह भी मत है कि जितने भी जन्म जाति सूचक पुछल्ले हैं ये हमारे गोत्र हैं, इनकी रक्षा करनी ही चाहिए। जिनमें शुक्ल, मिश्र, तिवारी, चौबे, दुबे, त्यागी, सेठी, पाठक, कपूर, खन्ना, पुरी, टण्डन, शारदा, अग्रवाल आदि प्रसिद्ध हैं। इन शब्दों के प्रयोगमात्र से यह ज्ञान हो जाता है कि अमुक व्यक्ति जन्म से ब्राह्मण है, क्षत्रिय है या वैश्य अथवा शूद्र है; क्योंकि गोत्रों के बहाने ये वर्ण-व्यवस्था के पक्के सन्तरी बने हुए हैं। इनमें अनेक तो विकृत हैं और अनेक शब्द शुद्ध कर लिए गये हैं। यथा-तगे से त्यागी, सारड़ा से शारदा, और मिस्र से मिश्र! बात यह है कि विवाहों के अवसर पर इनसे ख़ूब काम लिया जाता है। इनमें अनेक गोत्र नहीं हैं-यों ही गोत्रों की श्रेणी में गिने जाते हैं। फिर गोत्र का सवाल भी इतना पेचीदा है कि इसको हल करने के लिए बड़े साहस की आवश्यकता है। प्राचीन ऋषियों के आज्ञानुसार तो गोत्र वही है-जो ‘अपत्यं पौत्र प्रभृति गोत्रम’ में प्रतिपादित है। अब तो सारे वर्ण संकर हो गए है। देखिए-महाभारत में वनपर्व 180/31
‘संकरात्सर्ववर्णानांदुष्परीक्ष्येति मे मतिः’ अर्थात् वर्ण तो दुष्परीक्ष्य है। भाई! विवाह में त��� विशेष बात ध���यान देने की इतनी ही होती है कि अत्यन्त समीप के रिश्ते न हो जावें-बाकी यथायोग्य देखकर सम्बन्ध कर दिया जाता है। एक बात और-‘कृण्वन्तो विश्वमार्यम्’ को मानने वाले मुसलमानों को शुद्ध करके किस गोत्र में रक्खेंगे, ईसाइयों को किस गोत्र में डालेंगे और इसी प्रकार डच, यहूदी, पारसी किस गोत्र में गिने जायेंगे। वहाँ पुरी खन्ना तिवारी कहाँ मिलेंगे। सारे संसार में धर्मध्वजा फहराने का स्वप्न लेने वाले गोत्र की गणना में कबतक गाफ़िल रहेंगे। स्वामी दयानन्द के सिद्धान्तानुसार गुण कर्म से जब वर्ण व्यवस्था होगी तो पुरी खन्ना से, तिवारी अग्रवाल से और शुक्ल कपूर से सम्बन्धित हो जाएगा-तब इन गोत्रों की कितनी कीमत रह जाएगी। तभी स्वामी दयानन्द ने संस्कार विधि में लिख दिया है कि कन्या माता की छह पीढ़ी के भीतर भी हो तथापि उसी को देना अन्य को कभी न देना। इसलिए वर्ण व्यवस्था के ठेकेदारों को यह मिथ्याप्रलाप छोड़ देना चाहिए और तुरन्त इन तमाम पुछल्लों पर पोचा फेर कर एक विशाल ‘आर्य जाति’ का निर्माण करना चाहिए। हाँ! उद्देश्य सूचक और भावोद्वोधक उपनाम रखने में कोई हानि नहीं है। जैसे अभय, त्रिशूल, हितैषी, सनेही, विद्यार्थी, मेघार्थी और सत्यार्थी आदि। इस प्रकार नाम भेद भी हो जाता है और वर्ण व्यवस्था का दिग्दर्शन भी नहीं होता। अब इसी सिलसिले में कान्यकुब्ज, गौड़ और वाजपेयी का भी हाल सुन लीजिए। ये कैसे गोत्र हैं।
(1) ब्राह्मणों में सर्व श्रेष्ठ ब्राह्मण ‘कान्यकुब्ज’ माने जाते हैं। कान्यकुब्ज में दो शब्द हैं। कान्य और कुब्ज अर्थात् सौ कुबड़ी कन्याओं से जिनकी उत्पन्न हुई वे कान्यकुब्ज कहलाए।
सुप्रसिद्ध आप्टे के विशाल कोष में भी लिखा है कि कन्नौज का नाम ‘कन्याकुब्ज’ है।
यह क���ई कपोल कल्पित किस्सा नहीं है। प्रत्युत रामाय��� के बालकाण्ड अ. 32, 33 और 34 में इस विषय का विस्तृत वर्णन मिलता है। जब राम और लक्ष्मण को विश्वामित्र साथ लेकर सिद्धाश्रम से लौटे हैं तब कुश राजा के राज्य में पहुँचकर राम ने विश्वामित्र से पूछा है कि-
‘भगवन्! कोन्वयं देशः अर्थात् इस देश का क्या नाम है तब विश्वामित्र ने बताया है कि मेरा जन्म देश यही है और यह देश ब्राह्मणों की उत्पत्ति का केन्द्र है। ये सारे ब्राह्मण क्षत्रियों की सन्तान हैं। इस प्रकार ‘वर्णसंकर’ का दोषारोपण भी कर दिया। प्रमाण इस प्रकार है-
ब्रह्मयोनिर्महा नासीत् कुशोनाम महातपः।
अल्किष्टव्रतधर्मज्ञः सज्जन प्रतिपूजकः॥
अर्थात् कुश नाम का महातपस्वी राजा ‘ब्रह्मयोनि’ था। उसके वैदर्भी नाम की स्त्री से कुशाम्ब, कुशनाभ आदि चार पुत्र पैदा हुए। कुशाम्ब ने कौशाम्बी बसाया जिसको आजकल ‘कोसम’ कहते हैं-और कुशनाम क्षत्रिय राजा ने घृताची नाम की स्त्री में सौ सुन्दर कन्याएँ पैदा कीं। श्लोक इस प्रकार है-
कुशनाभस्तु राजार्षिः कन्याशत मनुत्तमम्।
जनयामास धर्मात्मा घृताच्यां रघुनन्दन॥
ये कन्याएँ वायु दोष से कुबड़ी हो गयीं। इन कुबड़ी सौ कन्याओं का विवाह चूली के पुत्र ब्रह्मदत्त से हुआ। ब्रह्मदत्त ब्राह्मण था। उसके स्पर्श मात्र से सभी कन्याओं का कुबड़ापन दूर हो गया।
स्पृष्ट मात्रे तदा पाणौ विकुब्जाः विगत ज्वराः।
युक्तं परमया लक्ष्म्या बभौ कन्याशतं तदा॥
अब स्वयं सोच लीजिए कि इन सर्वश्रेष्ठ ब्राह्मणों की उत्पत्ति कहाँ से हुई। हम तो इन बातों को बिलकुल नहीं मानते परन्तु हमारे कान्यकुब्ज भाई जब-जब अपना ‘कान्यकुब्ज’ गोत्र बतायेंगे, तब-तब हम भी वाल्मीकीय रामायण का हिस्सा सामने रख देंगे। शांतं पापम्।
कान्यकुब्ज लोग अपने को सर्व श्रेष्ठ ब्राह्मण मानते ��ैं। प्रम���ण रूप से प्रस्तुत करते हैं कि ‘‘कान्यकुब्जः द्विजाः श्रेयाः’’। न जाने कहाँ का यह प्रमाण है। यह संस्कृत में है इस लिए लोग इसे मान अवश्य लेते हैं। परन्तु वास्तव में कान्यकुब्ज लोगों में मांस भक्षण का विशेष प्रचार है। शुद्ध इतने बनते हैं कि ‘नौ कनौजिया दस चूल्हे’। इनमें ऐसे लोग भी हैं जो अपनी स्त्री के हाथ से भी भोजन बनवा कर नहीं खाते। ये लोग हस्तपाकी कहलाते हैं। परम पवित्र होते हैं। आर्य समाज में भी इस टाइप के उपदेशक होते हैं। भला हो इनका? जब मांसभक्षण में कनौजिए निपुण हैं तब शराब को क्यों छोड़ते होंगे। कहावत है-
‘‘बाला पियें पियाला, फिर बाला के बाला’’
बाला के शुक्ल मशहूर हैं। फिर वर्ण व्यवस्था के पक्के ठेकेदार हैं। आधा अछूतपन इन्हीं के कारण देश में है। इन्हीं में शुक्ल, तिवारी, मिश्र, पांडे सब शामिल हैं। अछूतोद्धार के मार्ग में इनके ये पुछल्ले बड़े बाधक हैं।
(2) अब ‘गौड़’ की कथा सुनिए। वेद में ‘गौर’ आया है उस का विवेचन तो फिर होगा। अभी तो देखिए-बंगाल देश का नाम गौड़ है। बंगाल में खजूर का गुड़ बहुतायत से होता है। खजूर की शराब भी वहाँ खूब बनती है-जिसका पान प्रायः सौ में नब्बे बंगाली करते हैं। इनमें चटर्जी, मुकर्जी, और बनर्जी सभी हैं। ये लोग उच्च कोटि के ब्राह्मण माने जाते हैं। मछली को तो ये लोग जल तोरी मानते हैं-और अण्डे को रसगुल्ला समझ कर खाते हैं।
ऐसे ब्राह्मणों को राक्षस कहा जाए या पिशाच परन्तु ‘गौड़’ ब्राह्मणों की उत्पत्ति का श्रेय इनको अवश्य है। इसीलिए ‘सुश्रत’ जैसे सुप्रसिद्ध आयुर्वेद ग्रन्थ में लिखा है कि ‘गोडः पाचन दीपनः’ अर्थात् गुड़ की शराब हाजमा बढ़ाती है। बात यह है कि गुड़ क�� हाजिम शराब को पीने वाले गौड़ लोग कहलाये। जिसके लिए मनु���्मृति जैसी पुस्तक ने भी मुक्तकंठ से निंदा की। मनुस्मृति में लिखा है-
गौडी पैष्टी च माध्वी च विज्ञेया त्रिविधा सुरा।
यथैवैका तथैवान्या न पातव्या द्विजोत्तमैः॥
अर्थात् गुड़ की बनी शराब, पिट्ठी की बनी शराब और महुवे की शराब तीनों ख़राब हैं। ब्राह्मण क्षत्रिय और वैश्य शराब न पीवें। सो उसी गुड़ की निषिद्ध शराब को पीने वाले गोत्र के गौड़ बड़े शुद्ध-बुद्ध मुक्त स्वभाव बने हुए हैं। एक बात मनुस्मृति के श्लोक में पाई जानी स्वाभाविक है-क्योंकि शूद्रों के लिए तो मनुस्मृति का बनाने वाला ख़ार खाए बैठा था। मनुस्मृति है ही क्या शूद्रों के विरुद्ध द्विजों का एक षड्यन्त्र? और पुरोहित शाही का पोषक एक प्रपञ्च!!! उक्त श्लोक में लिखा है कि द्विज शराब न पीवे। बेचारा शूद क्यों पीवे? क्या धर्मशास्त्र इसीलिए है कि शूद्रों को शराब पीने की आज्ञा देवे। अब समझ में आया कि शूद्र लोग मनुस्मृति को जलाने के लिए मशाल लिए क्यों अड़े हैं। हम तो मनुस्मृति को जला देने के लिए तय्यार हैं; चाहे आर्य्यसमाजी बिगड़ें या धर्म समाजी क्योंकि हम तो वेद को ही अपना धर्मशास्त्र समझते हैं।
इसी प्रकार एक दूसरा श्लोक भी शूद्रों को शराब पीने के लिए उत्तेजित करता है।
सुरा वै मल मन्नानां पाप्मा च मल मुच्यते।
तस्माद् ब्राह्मणराजन्यौ बैश्यश्च न सुरां पिबेत्॥
अर्थात् शराब अन्नों का मैल है इसलिए द्विज लोग शराब न पीवें। क्यों भाई! शूद्र तो पीवे। फिर मजा यह है कि ब्राह्मण लोगों ने खुद क़ानून बनाया और आज शूद्रों को भी विस्की पीने में मात कर गए। परन्तु हैं अभी शर्मा जी। इस शर्मा की छाप ने शराब को शरबत बना दिया और मांस को सेव का गूदा। कुछ न पूछिए। द्विजों के इस पाखण्ड ने वर्ण व्यवस्था को खूब मांजा है।
(3) अब तीसरे श्रेष्ठशिरोमणि ब्राह्मण देवता का हाल सुनिए। आप ब��जपेयी ���ने हैं। मध��यकाल ���ें जब ब्राह्मण लोग मांस शराब के खूब अभ्यासी हो गए तो यज्ञ करके सब उसी के नाम समेटने लगे। बकरा काटा यज्ञ के नाम पर और कर दिया पेट के हवाले। शराब का छींटा दिया यज्ञाग्नि में और उड़ेल गए गले की गटर में। पाप तो हुआ ही नहीं; क्योंकि ‘वैदिकी हिंसा-हिंसा न भवति।’ यह भी इनका बनाया कानून है। उसी सिलसिले में ‘वाजपायी’ प्रसिद्ध हो गए। ‘वाज’ नाम अन्न का भी है। यज्ञों में अन्न की बनी हुई शराब को पीने वाले ‘वाजपायी’ कहलाते थे। वाल्मीकीय रामायण में साफ़ है-‘‘वाजयेयान् दशगुणान् तथा बहु सुवर्णकान्’’ (उत्तर काण्ड) सो बिगड़ते-बिगड़ते अब ‘बाजपेई’ बन गए। हैं ये बड़े कटु किस्से। परन्तु हमने तो सत्य लिखने की शपथ खा ली है-इसीलिए लिखेंगे जरूर, चाहे फिर कुछ भी हो। यह है इन लोगों के गोत्रों की संक्षिप्त कथा। भाइयो!
कहानी से भण्डार पूरा भरा है।


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