बुधवार, 6 फ़रवरी 2013

"नमाज़ " एक कोरा  अंध विस्बास कैसे ? 

आज हम बात करते हैं की नमाज़ एक कोरा  अंध विस्बास कैसे है 

नमाज़ हर मुस्लिम दिन मे 5 बार पड़ता है इसमे दुआ पड़ी जाती है जिसका सम्बंध अल्लाह तक अपनी बात पहुचाना होता है उसे और सिर्फ उसे ही याद करना होता है बस्तब मे हम यह समझते है की एकाग्र(मन) हो कर अल्लाह को याद करना.
नमाज़ मे 2 चीजों का बिशेष ध्यान रखा जाता है 
1- सफाई ,इसके लिए "बुशु" अनिवार्या है
2-एकाग्रता(नियत बाँधना), इसके लिए 2 चीजे आबश्यक हैं 

 आ) नमाज़ मे महिला( खास कर 9 साल से उपरकी ) साथ में नमाज़ नही पड सकती है इससे ध्यान भंग हो जाता है 

ब) किसी भी नमाजी के पास से हो कर गुज़रना अपराध होता है इससे भी ध्यान भंग हो जाता है

सबसे पहले हम सफाई की बात करते है अल्लाह को तन की सफाई से कोई मतलव नही होता है उसे मन की सफाई से मतलब होता है 
क) अगर कोई गरीब,मजबूर,ज़ख्मी,कीचड़ मे सना हुआ दुखी बूड़ा अगर अल्लाह से गुआ मांगे तो क्या उसकी दुआ कबूल नही होगी अगर ऐसा है तो वो अल्लाह नही हो सकता है 

ख) अगर में किसी भी बजह से परेसान हूँ और में जानता हूँ की में अल्लाह के उतने करीब नही की मेरी दुआ कबूल कर लि जाये जबकि मेरे कर्म सही हों, और मेरे पास  2 लोग हैं जो मेरे लिए दुआ करने लायक है पर में उनमे से किसी एक से ही दुआ करवा सकता हूँ. एक मौलवी है जिसे कुछ प्रसाद दे कर फातियाँ लगबाऊ,और दूसरा एक फ़कीर है जो 5 दिन से भूँखा है जिसे में खाना खिलबाऊ. आप ही सोच सकते है क्या करने मे फायदा होगा ?



अब बात करते हैं एकगता की , हमारा पूरा सरीर  एक ओ यू की तरह काम करता है जिसका एडमिन मस्तिस्क(तंत्रिका तंत्र) होता है जो शरीर हर किर्या पर नजर रखता है और हर कार्य सिर्फ और सिर्फ मस्तिस्क के करण ही होता है अगर शरीर के किसी भी अंग को हिलना भी होता है तो इसके लिए पहले मस्तिस्क को सूचना मिलती है फिर मस्तिस्क के आदेश पर ही वो अंग हिल सकता है या कोई भी किरिया कर सकता है 
 है
1-केंद्रीय तंत्रिका तंत्र ( केंद्रीय तंत्रिका तंत्र को मस्तिष्क मेरु तंत्रिका तंत्र भी कहते हैं। इसके अंतर्गत अग्र मस्तिष्क, मध्यमस्तिष्क, पश्च मस्तिष्क, अनुमस्तिष्क, पौंस, चेतक, मेरुशीर्ष, मेरु एवं मस्तिष्कीय तंत्रिकाओं के 12 जोड़े तथा मेरु तंत्रिकाओं के 31 जोड़े होते हैं ।)

मस्तिष्क करोटि गुहा में रहता है तथा तीन कलाओं से, जिन्हें तंत्रिकाएँ कहते हैं आवृत रहता है। भीतरी दो कलाओं के मध्य में एक तरल रहता है, जो मेरुद्रव कहलाता है। यह तरल मस्तिष्क के भीतर पाई जानेवाली गुहाओं में तथा मेरु की नालिका में भी रहता है। मेरु कशेरुक नलिका में स्थित रहता है तथा मस्तिष्कावरणों से आवृत रहता है। यह तरल इन अंगों को पोषण देता है, इनकी रक्षा करता है तथा मलों का विसर्जन करता है।
मस्तिष्क में बाहर की ओर धूसर भाग तथा अंदर की ओर श्वेत भाग रहता है तथा ठीक इससे उल्टा मेरु में रहता है। मस्तिष्क का धूसर भाग सीताओं के द्वारा कई सिलवटों से युक्त रहता है। इस धूसर भाग में ही तंत्रिका कोशिकाएँ रहती हैं तथा श्वेत भाग संयोजक ऊतक का होता है।
तंत्रिकाएँ ( न्यूरॉन ) दो प्रकार की होती हैं : (1) प्रेरक (Motor) तथा (2) संवेदी (Sensory)।

मस्तिष्क के बारह तंत्रिका जोड़ों के नाम निम्नलिखित हैं:
(1) घ्राण तंत्रिका,
(2) दृष्टि तंत्रिका,
(3) अक्षिप्रेरक तंत्रिका,
(4) चक्रक (Trochlear) तंत्रिका,
(5) त्रिक तंत्रिका,
(6) उद्विवर्तनी तंत्रिका (Abducens),
(7) आनन तंत्रिका,
(8) श्रवण तंत्रिका,
(9) जिह्वा कंठिका तंत्रिका,
(10) वेगस तंत्रिका (Vagus),
(11) मेरु सहायिका तंत्रिका तथा
(12) अधोजिह्वक (Hypoglossal) तंत्रिका।
मस्तिष्क एवं मेरु के धूसर भाग में ही संज्ञा केंद्र एवं नियंत्रण केंद्र रहते हैं। मेरु में संवेदी (पश्च) तथा चेष्टावह (अग्र) तंत्रिका मूल रहते हैं

संवेदी तंत्रिकाएँ शरीर की समस्त संवेदनाओं को मस्तिष्क में पहुँचाकर अनुभूति देती हैं तथा चेष्टावह तंत्रिकाएँ वहाँ से आज्ञा लेकर अंगों से कार्य कराती हैं। केंद्रीय तंत्रिकाएँ विशेष कार्यों के लिए होती हैं। इन सब तंत्रिकाओं के अध: तथा ऊध्र्व केंद्र रहते हैं। जब कुछ क्रियाएँ अध: केंद्र कर देते हैं तथा पश्च ऊध्र्व केंद्रों को ज्ञान प्राप्त होता है, तब ऐसी क्रियाओं को प्रतिवर्ती क्रियाएँ (Reflex action) कहते हैं। 

2-स्वतंत्र तंत्रिका तंत्र  --यह स्वेच्छा से कार्य करता हैं। इसमें एक दूसरे के विरुद्ध कार्य करनेवाली अनुकंपी (sympathetic) तथा सहानुकंपी (parasympathetic), दो प्रकार की तंत्रिकाएँ रहती हैं। शरीर के अनेक कार्य, जैसे रुधिरपरिसंचरण पर नियंत्रण, हृदयगति पर नियंत्रण आदि स्वतंत्र तंत्रिका से होते हैं। अनुकंपी शृंखला करोटि गुहा से श्रोणि गुहा तक कशेरुक दंड के दोनों ओर रहती है तथा इसमें कई गुच्छिकाएँ (ganglions) रहती हैं

ध्यान केन्द्रिता का सिद्धांत : जब केन्द्रिय मस्तिस्क सभी किर्याओं से स्वतंत्र हो सॉर्फ किसी एक कार्य को विशेष रूप से करने को खास करके सोचने को तो इस किरिया को एकागरता या (नियत का बन्धना) कहते हैं पर एह तभी संभव होता है जब शरीर स्थर हो या फिर धीमी एक समान अवस्था मे हो ,जैसे एक समान अवस्था मे बैठा हो, एक समान अवस्था मे लेटा हो,एक समान अवस्था मे धीमे 2 चलता हो,या फिर कोई और एक समान अवस्था मे जिसमे मस्तिस्क पर और कोई अतिरिक्त भार नही होता है सिवाय सोचने  के,और जब दिमाग एकाग्र हो जाता है तो उसका संपर्क अन्य कार्यो से पूर्ण रूप से मुक्त होता है अब अगर पुना उसी अवस्था ( पूर्ण ऐक्टिव) मे लाना होता है तो बाहर से प्रबल कोशिश करनी पडिति है या फिर दिमाग जिस विन्दु पर मनन करता होता है पूरा होने पर स्वता अपनी पूर्व अवस्था मे आ जाता है .
उधारण :
आ)धीमी गति चलते समय जब उसकी मात्र पेर ही किरिया शील होते है और इस किरिया से मुख्या मस्तिस्क स्वतंत्र होता है इस अवस्था मे आंखे खुली होने पर भी सामने से आने बाले मनुष्य को नही देख पाता है और टाक्कर् हो जाती है 
ब) कभी कोई इंसान बैठे 2 अपने मन को एकाग्र कर कर कुछ सोचने लगता है और अपने पास होने बाले बिघ्न से अनजान रह जाता है और उसका साथी ज़ोर से चिल्ला कर कहता है की भी क्नहा खो गये हो और एह शायद हर इंसान के साथ होता है

नामज़ मे जो आसन प्रयोग होता है वो शष्टांग आसन का विकृत रूप ही है जिसे आरवीओं ने भारतीओ से शीखा है 
इस आसन मे इंसान का शरीर इतनी जगह से इतनी बार इतनी किरियाँ करता है है की मस्तिस्क को पूर्ण रूप से कार्यशील रहना पड़ता है की वो किसी भी हालत मे स्वतंत्र नही हो सकता है और जब स्वतंत्र नही होता तो उसका एकाग्र होना असम्भव है अता : इस विवरण से स्पस्ट होता है की नमाज़ पड़ते समय नियत नही बँध पाती है और वैसे भी अगर दिमाग एकाग्र(नियत बंधती) होता तो तो किसी के सामने से गुजरने बाली सामान्य सी घटना से नमाजी का मन बिचलित नही होता
अगर हम नमाज़ को आसन के रूप मे शरीर  के लिए स्वस्थ बार्धक़ माने तो भी ज़रा गौर करें 
1-एक दिन मे 5 बार और हर बार मे लगभग 1/2 घंटा लगाना मतलव 2.5 घंटे पूर्ण रूप से प्रयोग करना कितना उचित है 
2-एक ही आसन को एक ही दिन मे 5 बार करना क्या कुछ जादा नही है ? अगर है तो कंही इसका प्रतिकूल असर तो नही पड़ता है ?


अब अध्यात्म की बात करते हैं 

1 - नमाज या सलात. नमाजنماز एक फारसी शब्द है . इसका अर्थ नमस्कार या प्रणाम करना होता है . अरबी में नमाज के लिए कुरान में और हदीसों " सलवात " शब्द प्रयुक्त किया गया है . जिसे " सलात صلوات" बोला जाता है . इसका अर्थ .उपासना करना , किसी के आगे गिड़ गिडाना,या झुकना होता है ( पेज 1234 )
2 - तसबीह  (  تسبيح ). यह अरबी भाषा के मूल शब्द " सबह سبح" से बना है . इसका अर्थ याद करना . जपना . तारीफ करना .और किसी की महानता के आगे झुक जाना . या उसके आगे बिछ जाना होता है ( पेज 1232 )आम तौर पर जप करने वाली माला को भी तसबीह कहा जाता है . और इस्लामी माला में सौ (100 ) मनके होते हैं 
1-नमाज या सलात किसके लिए 
कुरान के अनुसार नमाज या सलात सिर्फ अल्लाह के लिए होनी चाहिए .क्योंकि अल्लाह सब का स्वामी है .जैसा कि इन आयतों में कहा है
" कह दो मेरी सलात ( नमाज ) मेरी कुर्बानी ,मेरा जीना .मेरा मरना केवल अल्लाह के लिए है . जो सारे संसार का रब है " सूरा -अनआम 6 :163 
कुरान के अनुसार नमाज पढ़ना भी एक प्रकार की इबादत है . जैसा कि इस आयत में कहा गया है 
" बेशक अल्लाह मेरा भी रब है और तुम्हारा भी रब है ,तो उसी की इबादत करो. यही सीधा रास्ता है "सूरा -आले इमरान 3 :51 

2-तस्बीह या जाप 
इस्लाम के पहले भी ईसाइयों .यहूदियों . और पारसियों में माला से जप करने , और सवेरे शाम ईश्वर के नाम का स्मरण करने की परंपरा थी .आज भी ईसाई पादरी जिस माला से जप करते हैं उसे " रोजरी ( Rosary "कहा जाता है . यही रिवाज इस्लाम ने अपना लिया है . जाप को ही तस्बीह कहा गया है . और कुरान में मुसलमानों को दौनों समय तस्बीह करने को कहा गया है .
हे मुहम्मद अपने रब की तस्बीह करो , सूर्य उदय होने के पहले और उसके अस्त होने से रात की घड़ियों में भी " सूरा - ता हा 20 :130 
" तुम अपने रब को बहुत ज्यादा याद करो .और सायंकाल और प्रातः उसी की तस्बीह करते रहो " सूरा -आले इमरान 3 :41 
" और जो लोग अपने रब को प्रातः काल और संध्या के समय पुकारते हैं . और चाहते हैं कि उसकी प्रसन्नता प्राप्त हो जाये . तो तुम ऐसे लोगों नहीं भगाओ " 
सूरा-अनआम 6 :52 
रसूल की बेटी फातिमा सुबह शाम तस्बीह ( माला ) लेकर अल्लाह के नामों का स्मरण करती थी .और माला में अल्लाहू अकबर 34 बार . अलहम्दु लिल्लाह 33 बार और सुबहान अल्लाह 33 बार नामों का जाप करती थी .
सही मुस्लिम -किताब 35 हदीस 6577 
" हमने तो पहाड़ों को उन लोगों के साथ लगा दिया है कि वे भी संध्या के समय और प्रातः काल " तस्बीह " करते रहें " सूरा-साद 38 :18 

अबू जर ने कहा कि रसूल ने कहा कि एक दिन मैं अपने घर के अन्दर था , तभी अचानक मेरे घर की छत खोल कर जिब्रईल अन्दर आगया . और उसने मेरा सीना खोल कर मेरे दिल को जमजम के पानी से धोकर साफ किया . फिर एक सोने के बर्तन में रखा हुआ ज्ञान मेरे दिल में भर दिया . फिर मुझे अपने साथ जन्नत ले गया .
और जब वहां के दरबान ने पूछा कि तुम्हारे साथ यह कौन है , तो जिब्राइल ने बताया यह मुहम्मद अल्लाह के रसूल हैं. और दरबान ने जन्नत का द्वार खोल दिया . जब मैं अन्दर गया तो देखा कि दायीं तरफ जन्नत के लोग थे और अगले हिस्से में आदम ,इदरीस , मूसा , ईसा ,और इब्राहिम थे . जिब्राइल ने मेरा सबाहे परिचय कराया और सबने मुझे सलाम किया . फिर जब मैं और आगे गया तो एक जगह से कलम से लिखने आवाज निकल रही थी . जिब्राइल ने बताया कि अल्लाह मुसलमानों के लिए रोज 50 नमाजें पढ़ने का हुक्म लिख रहा है . फिर अल्लाह ने वही आदेश लिख कर मेरे हाथों में दे दिया .जैसे ही वापिस आ रहा था . रस्ते में मूसा मिल गए .मूसा ने कहा कि 50 नमाजें तो बहुत जादा हैं . तुम अल्लाह से कुछ कम कराओ . तब अल्लाह ने नमाजों कि संख्या आधी कर दी . और जब मैं लौटने लगा तो मूसा ने कहा यह भी बहुत जादा है . तुम फिर अल्लाह से और कम करने को कहो . फिर अल्लाह ने उसकी संख्या आधी कर दी .इसी तरह फिर से मूसा ने कहा कि अल्लाह से और कम करने को कहा . जब मैं तीसरी बार अल्लाह के पास गया , और नमाजों की संख्या कम करने को कहा तो अल्लाह ने कहा चलो हम सिर्फ पांच नमाजों का हुक्म देते हैं . लेकिन अब इसमे कोई कमी नहीं हो सकती.यह सुनते ही मैं मक्का वापिस आ गया . इस तरह मैंने अपनी उम्मत के लोगों को नमाजों के भारी बोझ से बचा लिया 
बुखारी -जिल्द 1 किताब 8 हदीस 345

दुरूद 
मुहम्मद ने लोगों पर अपना अहसान जताकर नमाजों में अपनी और अपने परिवार की इबादत की तरकीब निकाली दुरुद कहते हैं
यह एक प्रकार प्रार्थना है . जो नमाज केसाथ पढ़ी जाती है . कुरान में " दुरुद  درود‎ " शब्द नहीं मिलता है . क्योंकि यह फारसी शब्द है .अरबी में दुरुद का वही अर्थ है जो नमाज या सलात"(صلوات  "का होता है .(corresponding to "durood" when used as a general term, is simply: "salawât" )दुरुद फारसी के दो शब्दों " दर " यानि द्वार और " वूद " यानि वंदन से बना है अर्थात किसी के द्वार पर जाकर उसकी वंदना करना . इसी लिए दुरुद को " सलात अलन्नबी الصلاة على النبي " भी कहते हैं .वास्तव में दुरुद के माध्यम से अल्लाह के द्वारा मुहम्मद की वंदना करवाई जाती है .दुरुद और उसका अर्थ देखिये .

  "अल्लाहुम्मा सल्ले अला मुहम्मदिन व् अला आले मुहम्मदिन कमा   सल्लैता अला इब्राहिम व आले इब्राहीम . इन्नक हमीदुन मजीद .
"अल्लाहुम्मा बारिक अला मुहम्मदिन व् अला आले मुहम्मदिन कमा बारिकता अला इब्राहिम व आले इब्राहीम . इन्नक हमीदुन मजीद 
अर्थ - हे अल्लाह मुहम्मद की वंदना कर , और उसकी संतानों की . जैसे तूने इब्राहीम और उसकी संतान की ,बेशक तू बहुत महान है . हे अल्लाह तू मुहम्मद और उसकी संतान को संपन्न कर जैसे तूने इब्राहीम की संतान को किया था . बेशक तू बड़ा महान है ."
आज जब भी मुसलमान नमाज के साथ दरूद पढ़ते हैं तो वह परोक्ष रूप से मुहम्मद की वंदना करते हैं . यही नहीं अल्लाह से भी मुहम्मद पर सलात भेजने ( वंदना करने ) का आग्रह करते हैं .और इसके पक्ष में कुरान की यह आयत बताते हैं
"निश्चय ही अल्लाह और उसके फ़रिश्ते नबी पर सलात भेजते रहते हैं . और हे लोगो जो ईमान लाये हो तुम भी नबी पर सलात भेजा करो '
सूरा -अहजाब 33 :56 

यदि मुसलमान कुरान को अल्लाह की किताब मानते है . तो कुरान में दिन भर में केवल दो बार ही नमाज पढ़ने का हुक्म मिलता है .दिन में पांच बार नमाज पढ़ने नियम मुहम्मद साहब की दिमाग की उपज है .दो बार नमाज पढ़ने आदेश कुरान की इन आयतों में मिलता है .
"और दिन के दौनों समय नमाज कायम करो . कुछ दिन के हिस्से में और कुछ रात के हिस्से में "
सूरा -हूद 11 :114 
"नमाज कायम करो , जब सूरज ढल जाये . और तब से अँधेरा होने तक " सूरा - बनी इस्राइल 17 :78

यद्यपि मुल्ले मौलवी अच्छी तरह से जानते हैं कि कुरान में सवेरे और संध्या के बाद केवल दो ही बार नमाज पढ़ने का स्पष्ट आदेश दिया गया है . लेकिन वह बड़ी चालाकी से " सलात यानि नमाज ' और तस्बीह यानि जप " शब्दों में घालमेल करके मुहम्मद कि वंदना करते है .और अल्लाह से मुहम्मद और उसकी संतानों की रक्षा और सम्पनता के लिए दुआ करते है .

Note : उपरोक्त विवरण से स्पस्ट है की किसी भी प्रकार से नमाज़ उचित नही है सिर्फ एक कोरा और घोर अंधविस्वास है फिर क्यू ना इसे छोड़ कर सतप्रेम और सतकर्म के रास्ते पर चलते हुए अपने 2.5 घंटे देश हित और विकास मे और बड़ा दिए जाएं ?



2 टिप्‍पणियां:

  1. खानग्रेसी प्रवक्ता शकील अहमद ने ट्विटर पर ट्विट किया कि "मोदी ने गुजरात का नमक खाया लेकिन गुजरात के ही लोगो का खून बहाया" शकील अहमद पहले तु ये बता की..... क) 1984 के दंगों में तुम खानग्रेसीयों ने सिख भाईयों को मारा | तो क्या सिखों का खूऩ, खून न होकर पानी था??? ख) गोधरा मे 58 रामसेवको को जिंदा जलाया और ऐसी बेदर्दी से जलाया की कारसेवको की लाशे कोयला बन गयी | तुम मुल्लो को जरा भी दया न आयी ?? क्या कारसेवको का खून भी पानी था ??? शकील अहमद तुने बात की "नमक" की तो जरा ये बता की....... अ) 26/11 हमले के आरोपी अबु जिंदाल उर्फ अबु हमजा (भारतीय मुल्ला) ने कहाँ का नमक खाया है भारत का या पाकिस्तान का ??? आ) संसद हमले के आरोपी अफजल गुरु (कश्मीरी मुल्ला) ने कहाँ का नमक खाया है भारत का या पाकिस्तान का ??? इ) मुबंई में अमर जवान ज्योती तोडने वाले मुल्लो ने कहाँ का नमक खाया भारत का या पाकिस्तान का या बंग्लादेश का ??? ई) वन्दे मातरम् पर फतवा जारी करने वाले तुम मुल्लो ने कहाँ का नमक खाया है भारत का या पाकिस्तान का ????! जबाव दे शकील अहमद

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