जातिवाद रहते, आर्थिक आरक्षण दलितों पर अन्याय! -2
भाग 2 मे , भाग 1 k आगे का लेख है
9-जातिवाद आध्यात्मिक रूप से महा पाप मात्र है
1-जो जैसा कर्म करता है उसे इसी जन्म मे सज़ा या फल मिलता है
2-बुरे कर्मो का फल येंही मिलता है ना की अगले पिछ्ले जनम मे अगर कंही पर ऐसा होता है तो उसकी यादास्त नही जाती है क्यू की अगर अपराधी को यादस्त जाने पर सज़ा मिलती है तो यह भी एक पाप है
3-अगर कोई निम्न कर्म करता है और सज़ा के तौर पर उसे निम्न वर्ण मे जनम मिलता है और उसकी यादास्त मे पिछछ्ले जन्म के कर्मो की याद नही है तो यह ईएश्वर् दुआरा उस पर किया गया अनैतिक अत्याचार ही माना जाये गा कोई स्ज़ा नही
4-अगर कोई किसी का कतल कर दे और उसे फांसी के सज़ा वॉल दी जाये और सज़ा के समय उसकी यादास्त चली जाये तो क्या कानून उसे फांसी पर लटकायेगा कभी नही फिर भगबान बिना याद दिल्ल्लाये कैसे सज़ा दे सकते हैं
5-आवागमन कर्म आधारित नही हो सकती है यह एक एकांतर क्रम मे क्रामिक क्रिया होती है एक के बाद एक जन्म की क्रिया हो सकती है जो लोग कहते है वो सब लोगों को डराने के लिए कहते हैं। जो कहते हैं की आवागमन कर्म के आधार पर होता है तो में उनसे सिर्फ इतना ही पूछूँगा की सबसे पहले जब भी इस सृष्टि का निर्माण हुआ होगा और पहला कीड़ा (जीव) जब पैदा हुआ होगा उसे किस जनम के बुरे कर्मों के कारण कीडे का जनम मिला और जो पहला मानव पैदा हुआ उसे किस जनम के भले कर्म का फल मिला। इसलिए आवागमन कर्म आधारित नही होता है वो एकांतर क्रम मे हो सकता है जिसका जब नंबर आया तब उसे आवश्यकता अनुसार किसी भी योनि मे जनम मिल सकता है। किसी विशेष कर्म के कारण अगर ईश्वर अपनी इच्छा से कोई विशेष जन्म भी दे सकते हैं।
नोट: कुछ लोग इस प्रश्न के विरोध में मुर्गी और अंडे वाली कहानी रख सकते हैं पर वो कहानी तर्कहीन है।
6-पुनर्जन्म भी अपूर्ण उद्देश्य को पूर्ण करने के लिए हो सकता है।
आत: मानव को जन्म के आधार पर जाती या धरम मे बाँटना अमानवीय,अनैतिक,निन्दनीय,और सबसे नीच कार्य है इसे समाप्त करना ज़रूरी है।
10-सरकारी जातियाँ: (भारतीय संबिधान की आत्मा मे घुशा हुआ खंज़र)
सरकार ने भी कई वर्ग बनाए हैं जो कि गलत हैं और देश कर लिए बहुत ही घातक हैं। आदमी किसी भी आधार पर बंटा हो उसमे उँच-नीच की भावना पनपना एक सामान्य बात है। और अगर नहीं पनपे तो अपने अधिकार हनन की भावना ज़रूर पनपेगी। आज इसका दुरपयोग ही हो रहा है अधिक जानकारी के लिए लिंक पढ़ें ।
अ) जब आय प्रमाण पत्र वनता है तो फिर जाति प्रमाण पत्रों को बनाने क्या फायदा है
ब) जो लोग आरक्षण का विरोध करते हैं वो मूर्ख हैं क्योंकि आरक्षण की जड़ है जन्म जात जाति और वर्ण जब जातिवाद खत्म होगा तब आरक्षण स्वता खतम हो जायेगा बुराई का पेड़ जड उखाड़ने से खतम होता है ना की फुल्छि काटने से, आरक्षण नही जातीबाद का विरोध करे क्योंकि जब तक जातीबाद रहेगा आरक्षण मांगने बाले लड़ते रहेंगे !
कुछ प्रश्न
1-क्या जो जातियाँ आरक्षण के अंतर्गत आती हैं उनमे सभी दलित है ?
2-क्या जिन जातियों मे आरक्षण मिलता है क्या उनमे वास्तव मे हकदारों को ही मिलता है या फिर कुछ गिने चुने लोगों को ही मिलता है ?
3-क्या इन जातिओं मे अमीर नही होते हैं
4-जिन को आरक्षण नही मिलता है क्या उन जातिओं मे सभी अमीर है और अगर नही है तो क्या उनके साथ अन्याय नही है
5-जो वास्तव मे आरक्षण के हकदार है उन्हें दलित होने के बाद भी लाभ नही मिलता है क्या यह अन्याय नही है?
6-अगर जातीबाद रहेगा तो क्या कट्टरबादी और जातिसम्मोहक लोग सिर्फ अपनी जाती के अधिकारो के हनन और अन्याय के नाम पर नफरत नही फैलायेंगे?
1-क्या जो जातियाँ आरक्षण के अंतर्गत आती हैं उनमे सभी दलित है ?
2-क्या जिन जातियों मे आरक्षण मिलता है क्या उनमे वास्तव मे हकदारों को ही मिलता है या फिर कुछ गिने चुने लोगों को ही मिलता है ?
3-क्या इन जातिओं मे अमीर नही होते हैं
4-जिन को आरक्षण नही मिलता है क्या उन जातिओं मे सभी अमीर है और अगर नही है तो क्या उनके साथ अन्याय नही है
5-जो वास्तव मे आरक्षण के हकदार है उन्हें दलित होने के बाद भी लाभ नही मिलता है क्या यह अन्याय नही है?
6-अगर जातीबाद रहेगा तो क्या कट्टरबादी और जातिसम्मोहक लोग सिर्फ अपनी जाती के अधिकारो के हनन और अन्याय के नाम पर नफरत नही फैलायेंगे?
निष्कर्ष
आज सभी देश के लिए कम अपने मजहव के लिए जादा लड़ते-मरते है जिधर देखो फलां जाती की महा सभा तमाशा बना रखा है देश और धरम का .
मनुवादियों का अति मोह
1-आज हमारे कुछ स्वर्ण भई लोग कहते है की जो हुआ सो भूल जाओ ठीक है भूलने को तयार है पर क्या वो गारंटी देंगे की अब कोई किसी के साथ भेद-भाव नही करेगा पिरताडित नही करेंगे और अगर कंही ऐसा होता है तो धार्मिक लोग उनका बहिस्कार करेंगे या उन्हें दंडित करेंगे पर इसका जबाब इनके पास नहीं है पर हमारे पास है की जातीबाद पर पूर्ण प्रतिबंध हो,
2- कुछ भई कहते है की दलितों को ब्राह्मण हो जाना चाहिए तो भाई जब सारे बर्ण बराबर हैं तो फिर ब्राह्मण् बनने या ना बनने का कोई महेत्व ही नही होता है और वर्ण कोई जाती ही नही बल्कि पद्द होते है एक आदमी एक ही दिन मे चारो पदोंन पर कार्या करता है हर इंसान के पास चारों वर्ण होते है तो वर्ण परिवर्तन का कोई महेत्व ही नही है व्राहमण भी तो शूद्र होता है ! जब जन्म जात कुछ होता ही नही है तो फिर जात आई ही कान्हा से , ज़रूरत जात बदलने की नही बल्कि इसपर पूर्ण प्रतिबंद की है और यही समय की मांग है इसी मे देश,धर्म,इंसानियत का भला हो सकता है .
3-जब कंही दलित पर अत्याचार होता है तो अपने आप को स्वर्ण कहने बाले कभी विरोध करते हैं यह बात अलग है की अगर कोई किसी पेपर या चैनल या किसी संस्था से जुड़े होने पर विरोध करे पर एक स्वर्ण होने के नाते कभी विरोध नही करता है वो चाह कर व्ही नही कर सकता है उसकी जाती उसे विरोध करने से रोकती है भले ही उसकी जाति ऐसा ना करती हो पर उसे दिल से ऐसा अवश्य महसूस होता है
आज हन सभी जानते है की देश और धरम का सबसे जादा नही अपितु सारा नुकसान सिर्फ वर्णबाद,जातीबाद के करण हुआ है
सिमटताभारत
1-अफ़ग़ानिस्तान सन 1876 मे अलग हुआ
2-नेपाल सन 1904 मे अलग हुआ
3-भूटान सन 1906 मे अलग हुआ
4-तिब्बत सन 1914 मे अलग हुआ
5-वर्मा सन 1937 मे अलग हुआ
6-पाकिस्तान सन 1947 मे अलग हुआ
7-बांग्ला देश सन 1947 मे अलग हुआ
8-चीन ने 41 हज़ार वर्ग मीटर जमीन छीनी सन 1962 मे
9-कश्मीर 70 % से जादा पाकिस्तान छीना बाकी छीनने का कार्या प्रगति पर
10-कश्मीर से मनुबादियों का सफाया
11- कश्मीर,उत्तर प्रदेश,बंगाल,असम,हैदराबाद अशान्ति की चर्म सीमा पर है
और हम क्या कर रहे है
1- जातिओं मे बट कर लड कर मर रहे है एक दूसरे को उँचा-नीचा समझ कर मर और मार रहे हैं
2- आरक्षण के नाम पर लड़ रहे हैं
3- जाती,गोत्र,धरम और प्रमे विवाह को अपमान मान कर ,अपने और अपने ही मासूम बच्चों को जिंदा जला कर मार देते हैं सोचो मेरे भाईओं जो धरम अपने मासूम बच्चों को गोत्र और जाती के नाम पर जिंदा जलाएगा वो कैसे फूल -फल सकता है इसलिए खांपियन,कठमुल्ले,कट्टरबादी, देश और धर्म और इंसानियत के दुसमन है इनका सफाया ज़रूरी है इसलिए इनका खुलकर विरोध करें
आखिर कब सुधरेंगे हिन्दू ,मनुबादी सिर्फ एक वर्ग से उनका प्रेम उन्हें ही खत्म कर रहा है कश्मीर इसका उदाहरण है।
आखिर कब सुधरेंगे हिन्दू ,मनुबादी सिर्फ एक वर्ग से उनका प्रेम उन्हें ही खत्म कर रहा है कश्मीर इसका उदाहरण है।
आरक्षण: ज़हर या ज़रुरत (आरक्षण से पहले जातिवाद खतम हो)
आज स्वर्ण सशक्त है और अपने को सम्मानीय समझता है। पर कब तक यह भी तो हो सकता है की आज जो दलित है कल को आरक्षण या अपनी मेहनत से 20-30 सालों मे सवर्णों से बहुत सशक्त हो जायें और अपमान के प्रतिशोध के रूप मे सवर्णो पर ही ज़ुल्म करने लगें तब क्या होगा? समय हमेशा बदलता रहता है इस दुनिया मे कुछ भी हो सकता है इंसान को किसी भी आधार पर बाँटना सिर्फ घातक है और अमानवीय है
इसलिए कुछ ऐसा करो जो अधिक समय तक समानता बनी रहे:
आरक्षण एक ऐसाशब्द है जिसको हम पूरी तरह से नकार नही सकते हैं आज हमारा समाज इसके लिए जिस तरह से बटंता जा रहा है वो देश के लए पूर्ण खतरा है आरक्षण ज़हर है या ज़रूरत है इसे सम्जह्ने से पहले हमे अपनी जात पात को समझना होगा और उसे मिटाना होगा वातव मे कोई भी स्ववर्ण नही नही पर दलित ज़रूर हैं दलित कोई जात नही है यह एक शव्द है जो गरीवं के लए उपयोग होता है परंतु कुछ लोग स्ववर्ण से अपने को उच्च जात वाला समझते है जो की ग़लत है हम लोग गरीवऔर अमीर तो हो सकते हैं पर निम्न और उच्च नही और जो ऐसा समजते है वो अपने धर्म के खिलाफ ही कुकर्म करते हैं जिसकी वजह से हम दिन प्रतिदिन कमजोर हो ते जा रहे है
1 स्वर्ण पच्छ :
आरक्षण की ज़रूरत .
1 स्वर्ण भी 100% अमीर नही हैं कुछ ऐसे हैं जो सही से रोटी पानी का गुज़रा करने मे असमर्थ हैं
2-योग्यता के आधार पे नौकरी ना मिल्पने के कारण यूबा निराश होकर बिदेश जा रहे हैं जिससे प्रतिभा का पलायन हो रहा है
3 - ज़िमेदार पदों पे अयोग्या लोगो का लगाने का मत्लव है देश को ख़तरे मे डालना
समीकचा :
1 किसी भी वर्ग के सभी (दलित) लोगों को सरकारी नौकरी ही मिले यह यह बहूत कठिन कार्य है उस वर्ग के संम्पन्न लोगों ki भी ज़िमेदारी बनती है की वो दलित लोगों को उठाने मे वियक्तिगत मदत करे सिर्फ़ सरकार के ही उपर ना रहें जिनेह सरकारी नौकरियाँ प्राप्त हैं वो भी उनके लए वियक्तिगत तौर पे कुछ करें सरकारी तौर पे नही.
2- एक बाप कभी भी अपनी जायदात बाँटते समय अपने लड़कों की योग्यता नही देखता है परंतु हन उसका कोई करोवार चलता है और उसमे कोई एक बड़ी ज़िमेदारी का पद होता है तो बह उसे ही देगा जो योगया हो इसके लए वो लड़कों की परीक्चा भी ले सकता है परन्तु बात यह आती है अगर जिस लड़के को बाप ज़िमेदार समझ के कोई बड़ा पद देता है और वो लड़का अपने अधिकारों का दुरपयोग करके अपने और भाईओं के अधिकारों का हन्नन करे तो लाज़मी है है की उसे उस पद से हटा दिया जाए अगर फिर भी नही मानता है तो महा भारत एक उधारण है
3- जो योग्यता की बात करते है तो क्या ज़रूरी है की वो ग़लत काम ना करे अगर वास्तव मे यह होता की योगया लोग पकच पात ना करते तो सायड देश की यह हालत ही ना होती
4- अगर हम 50% (lagbhag) आरक्षण निकल दें तो 50% आरक्षण बचता है जिस पर स्वर्ण ही आसीन होते हैं फिर जब 60% से उनका पूरा नही हुआ तो और बड़ाने से क्या उनका पूरा हो जाएगा कदापि नही
5-. क्यू सोचते हैं की हम सिर्फ़ भारत मे ही रहे क्यू नही . के तरह नही सोचते की हम जो भी करें उससे पूरी दुनिया लाभ उठाये चाहे हम कन्ह��������� भी रहके काम करे पर अपने देश को कभी नही भूलना चाईए और समय पे अपने देश के हिट मे भी काम करना चाईए आरक्षण से हम पलायन को कभी भी नही रोक सकते हैं हम बाहर जाने बाले लडको -लड़किओं की help करके अपनी और अपने देश की इज़त और बड़ा सकते हैं हम चाएँ कही भी रह के काम करे पर उसका प्रत्यखच या अप्रतयक्च रूप से लाभ भारत को ही मिलेगा
निष्कर्स = निष्कर्स तो 100% यही निकलता है की स्वर्ण के लए आरक्षण किसी भी तरह से उचित नही है
दलित पक्छ :
1 2000 सालों से साशित वर्ग दूरा प्रताड़ित और सिक्चा से बंचित रहने के कारण योग्यता के आधार पे स्वर्नो से मुकाबला नही कर सकते है
2- एक बाप रोटी बांटते हुए कभी फ़र्क नही करता और ना ही योग्यता देखता है
3-80% दलित आज भी गरीव ही है और उसे उपर उठाने को आरक्षण की परम ज़रूरत है
4- बिना आरक्षण के दलित देस के बिकास हेतु मुख्य धारा मे नही आ सकता है
समीकचा:
1- यह कहना की दलित वर्ग योग्यता के आधार पे स्वर्ण से मुकाबला नही कर सकता है सरसार ग़लत है गुलामी और स्वर्नो की दास प्रथा के अंदर रह के भी दलित लोगों ने अपनी योग्यता का लोहा मनवाया है दलित योग्यता मे पीछे नही है बस सीखचा मे पीछे है इसके लए जागरूकता की कमी और स्वर्नो की दलितों के प्रति उदासीनता है अगर दलित समाज शिक्चित होगा तो योग्य तो स्वता ही हो जाएगा आता संपन्न समाज दलितों को जागरूक करने हेतु प्रयास करें इसके लए सरकार की तरफ से छूट की ज़रूरत है ना की आरक्षण की
2-एक बाप रोटी बनते समय भले ही फ़र्क ना करे पर कोई ज़िमेदारी वाला काम देते समय परख ज़रूर करता है अगर ज़िमेदार इंसान पखचपात करे तो उसका विरोध करना और उसका पद से हटन ही उचित है पर योग्यता प्रमुख है
3 -दलित समाज दवा कुचला है उस पर बहूत ज़ुल्म हुए है पर इन ज़ुल्मों के लए ज़ितना संपन्न समाज जिम्मेदार है उससे भी ज़डा दलित समाज है क़्की ज़ुल्म करने वाले से ज़ुल्म सहने वाला ज़ाडा दोषी है दलित समाज के सामने संपन्न समाज 20% ही थे जिसका विरोध अगर सारे दलित एक हो के करते तो संपन्न समाज की ऐसी की तैसी हो जाती पर दलित लोग अपनी अंध भक्ति के कारण और ईस्वर मे अटूट विस्वाश के कारण कभी भी विरोध नही कर पाए और ज़ुल्म सहते गये आज भी जागरूकता की कमी कारण ऐसा ही कर रहे हैं और संपन्न समाज अपने घमंड मे ज़ुल्म (विस्वास तोड़ता) करता गया और अपनी ही तागत को खोता चला गया गरीवी केलिए संपन्न समाज से जाड़ा दलित की संतान उत्त्पति को ना रोकना है सरकार 100% आरक्षण दे के भी गरीवी दूर नही कर सकती है दलितों के मुख्य धारा से ज़ोड़ने के लए कुछ बाते मुख्य है
1 जात पात का सफ़ाया
2 संपन्न समाज दलित समाज की तरफ ध्यान दे और कुछ कार्य उनके उत्थान के लए करे
3 स्वता मेहनत करके सन साधन बडाना और जादा रोज़गार पैदा करना
4 सर कार छूट को बडाना
5 संतान उत्तपत्ति को सीमित करके 2 पर ही रोकना
5 जो आरक्षण मिला हुआ है उसका सरासर दुरपयोग होने से रोकना , दलित सामाज मे भी आरक्षण का लाभ सिर्फ़ उन्ही लोगों को मिलता है जो संपन्न है जो वास्तव मे आरक्षण के हक़दार है उनेह इसका लाभ नही मिलता है जिन लोगों को लाभ मिलता है उनका संबंद इनमे से किसी एक के साथ होता है.
1 वो इतना सम्पन हो की रिसवत आराम से दे सके
2 उसका कोई संबंधी नेता हो
3 उसके घर का कोई सदस्या सरकारी संस्थान मे
आरक्षण का लाभ सिर्फ़ उस को मिलेगा जिसके पास उपरोक्त मे से 1 या 2 या फिर 3 चीज़े . वास्तविक लाभार्थी को कभी भी कोई फायदा नही मिलता है. में सिर्फ़ कागजों के आधार पर या कोई मन गढ़न्त बात नही कर रहा हूं में सिर्फ़ ज़मीनी हक़ीकत बता रहा हूं.
5 कुछ ऐसे परिवार है जिनके हर सदस्या को आरक्षण का लाभ मिला हुआ है 10 के 10 लोग सरकारी नौकरीओं पे हैं. है . और कुछ गांव पुर के पुर सरकारी नौकरी से बंचित है योग्यता होने के बाद भी ऐसे आरक्षण का क्या लाभ जिसका सिर्फ़ दुरपयोग ही होता है
.इन सारी बातों से सॉफ होता है की दलित वर्ग को जो आरक्षण दिया गया है उसका सिर्फ़ दुरपयोग ही होता है फिर आरक्षण का कोई मतलव ही नही उठता है फिर भी में आरक्षण को पूरता निरस्त नही कर रहा हून में यह कह रहा हू की आरक्षण निम्न कारणो से नही होना चाहिए
1 जात पात के आधार पर
2 किसी वर्ग के आधार पर
3 योग्यता के आधार पर सिर्फ़
4 ना ही किसी ऐसे वर्ग को इसका लाभ मिले जो देश के लए ख़तरा हो
अगर फिर भी समाज के दवे कुचले लोगों को उपर उठाने हेतु आरक्षण ज़रूरी है तो उसके निम्न आधार होने चाहिए
1 योग्यता प्रमुख
2 निम्न(दयनीए अर्थ वियवास्ता)
3 चयन मे पूर्ण पारदार्सीता
नोट : आरक्षण हेतु उपरोक्त तीनो का होना परम आवास्याक है हम आरक्षण को पूर्णता नकार नही सकते हैं जब तक की पूर्ण रूप से बेरोज़गारी समाप्त ना हो जाए पर ऐसा तभी हो सकता है जब भारत पूर्ण रूप से जात-पात से मुक्त हो ,एह कार्य मुस्किल ज़रूर है पर असंभव नही है.
देश के विकास और आरक्षण को समाप्त करने तथा बेरोज़गारी को दूर करने के लए जो सबसे ज़रूरी हैं वो है
. 1 जात पात का सफ़ाया
2 रोटी-वेटी मे समानता
3 जनसंख्या विरधि पर तत्काल प्रवओ से रोक
4 व्यापक स्तर पर जागरूकता के प्रयास
5 देश भक्त तगत्ो का एक होना बिना ज़मीनी हक़ीकत जाने आपस मे आरक्षण आरक्षण कह के लड़ना महा मूर्खता है और देश द्रोही तगत्ों को मजबूत करने के बर|बर है सरकारे सिर्फ़ अपने फायदे के लए हमे आपस मे लड़ा रहीं है और हम तू दलित में स्वर्ण कह के आपस मे लड़ रहे हैं जबकि आरक्षण जैसी चीज़ का सिर्फ़ नेता अपने फायदे के लए दुरपयोग ही करते हैं
अब तक हमने जो भी बात कही है वो सिर्फ इस बात को लेकर तीन की जातीबाद किसी भी रूप से उचित और स्वीकार्य नही है
1- जातीबाद के करण ही देश का बहुत सा पतन हुआ है आज तक भारत का संबिधान चाह कर भी अपने नागरिकों को पूर्ण रूप से समानता का अधिकार देने मे असफल हुआ है आज भी देश के कई इलाखों मे जात के नाम पर उँच नीच है
2- समाज मे जातीबाद की सीमा के कारण एक लड़की का पिता अपनी लड़के के लिए अपनी ही जात मे वर देखने को मजबूर होता है और इसके बदले मे वो हद से ज़ादा दहेज भी देता है अगर जातीबाद की सीमा ना हो तो बहुत हद तक दहेज प्रथा, कन्या भूर्ण हत्या, छुआ छूत, भेद भाव जैसी कई कुप्रथाओं से निज़ात पा सकते हैं
3-आज हमारे देश मे कोई भी नेता गरीव का पक्छ धर नही है बल्कि किसी एक बिशेष जाती के दलित (गरीव) का ही पक्छ धर होता है उसे सिर्फ जाती दिखती है रास्ट्र नही उसकी सोंच संकीर्ण हो चुकी है वो सिर् जाती के लिए लड़ता है और लोगों को एक करता है या कहनें तो बहकाता है और भोली भाली जनता उसकी बातों मे आकर खंडो मे बटती जा रही है इतना ही नही कभी आरक्षण ,कभी अधिकार , तो कंही सम्मान के नाम पर ही अपने ही भाईओं से लड रही है एह नेता ऐसा इसलिए कर रहे है किओंकी इस्स्से उनका राजनीतिक और आर्थिक फायदा होता है पारनाटु देश और धरम का तो सर्वधा नुकसान ही होता है आज इन नेताओं की महत्वकांचायें कम है तो आरक्षण के नाम पर और आयेज आने बाले समय मे जब इनकी महत्वकांचायें अधिक बड जायेंगी तब एह लोग जाती के आधार पर देश को बांटने की मांग करने लगेंगे इस आधार पर देश कई बार बत चुका है इसलिए एह देश के लिए बहुर ही घातक है
4-आज हम बात करते हैं की यूरोप मे हमारे किसी मनुष्य के साथ जातीय या नस्ल भेदिय टिप्पणी हो गई तो पूरा मीडिया हो हल्ला करता है एह सही भी है पर हमारे ही देश मे जिन छेत्रों मे जाति या छेत्रवाद के नाम पर कई राजों मे अमानवीए विय्व्हार किया जाता है तब मीडिया कुछ भी नही बोलता है उस पर कोई भी बहेस नही होती है अगर मीडिया से इस पर सबाल करो तो कहती है इसकी खबर ही नही थी पर ऐसा नही है जो मीडिया सात समन्दर पार होने बाली घटना पर ध्यान रख सकती है वो अपने ही देश के अंदर होने बाली इस प्रकार की घटनाओं पर नज़र क्यू नही रख सकती है सॉफ सी बात है मीडिया ऐसा करना ही नही चाहती है जो बहुत ही गलत है अगर हम अपने घर को ही नही सुधार सकते है तो दूसरे को सुधारने के उपदेश कैसे दे सकते है उन पर बोलने से पहले हमें अपने घर के अंदर के बटावर्ण को भी सुधारना होगा तब ही हम किसी पर सबाल खड़े कर सकते हैं
5- बाबा साहब भीम राब अम्बेडकर जी ने आरक्षण इस लिए दिया की दलित समाज के कुछ योग्य लोग आगे आयें और अपने सामाज को जागृत करे ताकि पूरा सामाज मुख्य धारा मे आत्मसात हो सके परंतु जो लोग आरक्षण पा कर आगे बड़ते है वो स्वम् भी सामंत वादी हो जाते है और वो भी दलित संमज के साथ आपनो जैसा विय्व्हार नही करते है इसके भी दो कारण है
आ) कोई भी महेत्व पड पाने के बाद कुछ लोग अपने आप को दलित समाज से अलग समझने लगते है और अपने आप को गैर दलित लोगो के तरह ही पेश करते है
ब ) कुछ लोग ऐसे होते है जो कुछ करना तो चाहते है पर जिस जगह पर वो होते हैं उस संम्ज के लोगों मे अपने सम्मान को खोने के दर से उन्ही मे मिल जाते है जिसका परिणाम बहुत ही घातक होते है
6- आज भी भारत के कई इलाखों मे दलितों के साथ सही विय्व्हार नही होता है इतना ही नही कुछ योग्य दलित आज भी कर्ण के नियम का ही पालन करते है सम्मान पाने और अपने पड पर बने रहने के लिए वो झूंट बोलकर स्वर्णो मे सामिल हो जाते है किओंकी अगर वो गलती से भी सच बोल देते है दूसरे समाज के लोग कंही भी उनका सम्मान नही करते है इसलिए अपने सम्मान की रक्छा के लिए मजबूरन कर्ण के नियम को अपनाते है जैसे की कर्ण ने महाभारत काल मे विद्या प्राप्त करने हेतु परशुराम से झूंट बोला था आज भी लोग ऐसा क्रने को मजबूर है जबकि देश आज़ाद हुए 60 से ज़ादा साल हो गये है
निष्कर्ष
1- जातिवाद किसी भी प्रकार से देश, समाज, धर्म और मानवता के हित मे नही है
2- जब तक जातिवाद संमाप्त नही होता है तब तक देश और समाज का सम्पूर्ण विकास असंभव है
3- जातिगत आरक्षण मिटना ज़रूरी है परन्तु उससे भी ज़रूरी एह है की आरक्षण से पहले जातीबाद मिटे, आरक्षण तो स्वता ही मिट जायेगा, परंतु जातीबाद को मिटाय विना ही आरक्षण समाप्त करने का मतलव है हमारे दलित भाईओं के अधिकारों हनन करना उनेह विकास की मुख्य धारा से प्रथक करना और एह अनुचित ही नही घोर अपराध और पाप भी है. किओंकी जब तक जातिवाद रहेगा आरक्षण मांगने बाले गलत नही है
4- देश मे सम्भिधान निर्माण के समय चाहे जो भी कारण रहे हो जातीबाद को सम्म्लित करने के परन्तु क्या आज 60 सालों बाद भी कया देश का सिस्टम इतना कमजोर है की जातीबाद को खतम नही कर सकता है आज भी देश का सिस्टम उस जातिवाद पर निर्भर है जो ना तो धार्मिक ही है और ना ही न्याय प्रध | तथा कथित जातिवाद या वर्णवाद बहुत ही भ्रामक और असत्य अधारमिक नियम है उस पर देश चलने को क्यू बाध्य है
5- आज सबको इतना गहनता से सोचना होगा जितना दुख स्वर्ण को जातिगत आरक्षण से है उससे कंही गुना जादा दुख दलित को इस जातिवाद से है और दुख ही नही दलित तो कई हज़ारों सालों से इस जातिवाद से प्रताडित भी है और आज भी प्रताडित हो रहा है फिर जब आरक्षण हटाने की बात होती है तो फिर जातिवाद को हटाने की बात क्यू नही होती है
6-जातिवादी समाज मे अगर आर्थिक अरकछन हो और अगर किसी इंटरव्यू के लिए दो छात्र जाटीए है उनके प्र पात्रो से उनकी जाती पता चल जायेगी अगर इंटरव्यू लेने बाला कथित स्वर्ण हो और इंटरव्यू देने बाले छात्र दलित और स्वर्ण हो तो क्या गारंटी है की वो इंटरव्यू न्याय पूर्ण लेगा .
अब बात आती है की जातीबाद अगर खतम भी हो जाये तो क्या धरम के आधार पर भेदभाव नही होगा
सबसे पहले हमे सोचना होगा की धर्म होता क्या है धर्म = धारण करने योग्य अर्थात धर्म एक विचार है जिसे धारण करना होता है ,हम अपना विचार किसी पर ज़बर ज़स्टी थोप नही सकते है येन्हा तक माता पिता भी अपने विचारों को अपनी संतानों पर थोपने के लिए आधुनिक युग मे बाध्य नही है अर्थात धर्म का जन्म से कोई भी सम्बंध नही है कोई भी विय्क्ति जनम के बाद ही बड़ी सोच समझ कर ही किसी विचार (धर्म ) को ग्रहण कर सकता है एह ज़रूरी है की वो अपने माता पिता के विचारों का सम्मान करे परन्तु बो किसी भी तरह से उनेह आत्मसात करने को बाध्य नही हो सकता है
1-हिन्दुत्व विचारों का एक समूँह है जिसमे शाक्त, शिव, जैन, सीख, बुध,इस्लाम,फ़ारसी ,आर्य समाजी, नास्तिकता एवं अन्य सभी आ जाते है कुछ एक को छोड़ कर |
2-हमारे देश मे बहुत ही अच्छी प्रक्रिया है धर्म निरपेकचता जिसका मतलव होता है सभी धर्मो का समान सम्मान करना
3-कानून मे एक नया नियम हो जिसके तहेत किसी भी सरकारी और गैर सरकारी काग़ज़ पर जाति के साथ साथ किसी भी धर्म का उल्लेख नही करना चाहिय बल्कि उसकी जगह दो कोड वर्ड लिखने चाहिय जैसे ध. नि. ( दो या दो से अधिक या सभी धर्मो का सम्मान करने बाला) , ग. ध. नि. (किसी एक बिशेष धर्म को महेत्व देने बाला चाहे बो कोईसा भी मजहव क्यू ना हो )
ऐसा करने से सारी समस्यां समाप्त हो सकती हैं
नोट : कोई भी देश तब तक पूर्ण बिकसित नही हो सकता है जब तक की आर्थिक ढांचा मजबूत होने के साथ 2 सामाजिक समानता ना हो !
हम उपरोक्त गिराफ के आधार पर ही बात करते हैं .
सामाजिक समानता
1- मुख्य हिन्दू समाज (हिन्दू,जैन,फ़ारसी,बौध,सिख) सम्पूर्ण रूप से हाई –टेक हो जिसमे अन्य वर्गों को आत्म सात करने की छम्ता हो .
( जिस प्रकार से अमेरिका मे रहने बाले अंग्रेज़ों की लाख बुराई करते हैं फिर भी अनुसरण उनका ही करना चाहते हैं इसके पीछे उनका हाई टेक होना है , ठीक इसी प्रकार हिन्दू संमज इतना हाई टेक हो ताकि हर बर्ग उनका अनुसरण करने मे अपना गर्व महसूस करे.)
2- अन्य वर्ग : अनय सभी वर्ग भी इतने सक्छम हों की मुख्य समाज मे आत्म सात होने और उनका अनुसरण करने मे गर्व महसूश कर सकें
उपाय
आ ) जातिवाद का अंत तुरंत हो इसके लिए जातिवाद को गैर धार्मिक और गैर कानूनी घोषित किया जाय ताकि समाज मे फैले भेद भाव का अंत हो और समानता की स्थापना हो.
ब )समाज मे फैले अंध विस्वास पर भी पूर्ण रोक लगे.
सी ) भारत जैसे देश मे अधिकांश लड़के और लड़कियां योगिता होने के बाद भी ,सेक्स की समय पर पूर्ति ना होने , अपने अनुसार विवाह ना हो पाने , सेक्स प्राप्ति मे आने बाली सामाजिक बुराइयों के आने से कुंठित होकर अपने योगीयता खो देते हैं
इस लिए देश मे सेक्स की स्वतंत्रता का कानून होना ज़रूरी है , सेक्स सुतंत्रता से मेरा मतलव असलीलता से कतई नही है में एक ऐसी स्वतंत्रता की बात कर रहा हूँ जंहा पर एक लड़का और लड़की अपनी मर्ज़ी से शादी करने ,सेक्स करने (जंहा पर सार्वजनिक स्थान ना हो) ,एक साथ रहने के लिए , किसी भी समाज की कोई परमीसन की ज़रूरत ना हो और लोग (समाज) सेक्स को गुप्त, बदनामी का कार्य ना समाज कर , शरीर की ज़रूरत और प्राक्रतिक कार्य समझे.
आर्थिक विकास
1- जनसंख्या पर पूर्ण रोक लगने से पहले भारत की कोई भी सरकार कुछ भी कर ले आर्थिक स्थिति मे सुधार नही कर पायेगी .
2- जातीय आरक्षण को समाप्त करके आर्थिक आरक्षण या फिर आर्थिक छूट ही देने का कानून हो
3- रोजगार के स्थाई उपाय.
आ)औधोगीकरण का विकाश करना इसके लिए ………काम कर सकते हैं.
ब) स्थाई रोजगार हेतु बच्चों का जन्म जात रोजगार बीमा होना अनिवार्य है .
आगे का लेख अगले भाग मे ....
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