निज़ी छेत्रों में आरक्छण दलित हित के खिलाफ,कारण आंबेडकर वाद पर कर्ण का सिद्धांत हावी ।
कुछ दलित नेता कई सालों से दलितों के लिए निजी संस्थानो में आरक्छण कि मांग कर रहे है हो सकता है उनेह कुछ फायदा दीखता हो परन्तु जंहा तक मेरा सबाल है मुझे तो इसमें सिर्फ दलितों का नुक्सान ही दिख रहा है इसके निम्न कारन हैं
१- निजी छेत्रो में जातिवाद न के बरावर है कुछ एक लोग ही है जो आज इस गन्दी बात को महत्व देते है जादातर लोग जातिवाद को महत्व नहीं देते हैं
२-निजी छेत्रों में नौकरियां जाति प्रमाण पत्रो के आधार पर नहीं मिलती है योग्यता के आधार पर मिलती हैं
३-सब जानते है दलित समाज ८५ % और सवर्ण समाज सिर्फ १५ % ही है परन्तु निजी छेत्रों में बहुत अधिक संख्या दलित समाज कि होती है जो अपनी योगयता के बल पर चयनित होती है उनके साथ पक्चपात नहीं होता है बांह सिर्फ कम कि बात होती है
४- आज भी अधिकतर ९० % दलित लोग कर्ण के सिद्धांत पर अपनी जात को छिपा कर काम करते हैं या कह सकते है अपने को सवर्ण में आत्म सात करके काम करते है कुछ भी सही पर लोगों को रोजगार तो मिलता है
५-अगर निजी छेत्रों में आरक्छण लागू होगा तो नौकरियां योग्यता कि जगह जाति प्रमाण पत्रों को देख कर मिलने लगेंगी जिससे व्यापारी का तो नुक्सान होगा ही साथ में दलितों का भी बहुत बड़ा नुक्सान होगा किओंकी कोई भी आरक्छन ५० % से अधिक नहीं हो सकता है जबकि उनकी संख्या ८५ % से भी जादा है अगर हम ५० % भी आरक्छन देंगे तब भी ३५ % दलित लोग नौकरी पाने से बंचित हो जायेंगे उनकी जगह सवर्ण आ जायेंगे सीधे २ ३५ % नौकरिओं का नुक्सान।
६- आज अगर कोई दलित दयनीय अवस्था में है और उसके पास कोई फर्म है अगर बांह पर सवर्णो का बोल बाला हो तब वो दलित कर्ण के नियम पर अपने को सवर्ण बता कर काम प् सकता है और अपनी सुधार सकता है परन्तु जब आरक्छण लागू हो जायेगा तब तो वो चाह कर भी रोजगार नहीं प् पायेगा अगर उस कंपनी का आरक्छण कोटा भरा हो
निष्कर्ष : हम सीधे २ कह सकते हैं कि निजी छेत्रों में आरक्छण दलितों के हित में नहीं इतना ही नहीं यह जातिवाद को वढ़ावा भी देगा जिससे अराजकता भी फ़ैल सकती है
कुछ दलित नेता कई सालों से दलितों के लिए निजी संस्थानो में आरक्छण कि मांग कर रहे है हो सकता है उनेह कुछ फायदा दीखता हो परन्तु जंहा तक मेरा सबाल है मुझे तो इसमें सिर्फ दलितों का नुक्सान ही दिख रहा है इसके निम्न कारन हैं
१- निजी छेत्रो में जातिवाद न के बरावर है कुछ एक लोग ही है जो आज इस गन्दी बात को महत्व देते है जादातर लोग जातिवाद को महत्व नहीं देते हैं
२-निजी छेत्रों में नौकरियां जाति प्रमाण पत्रो के आधार पर नहीं मिलती है योग्यता के आधार पर मिलती हैं
३-सब जानते है दलित समाज ८५ % और सवर्ण समाज सिर्फ १५ % ही है परन्तु निजी छेत्रों में बहुत अधिक संख्या दलित समाज कि होती है जो अपनी योगयता के बल पर चयनित होती है उनके साथ पक्चपात नहीं होता है बांह सिर्फ कम कि बात होती है
४- आज भी अधिकतर ९० % दलित लोग कर्ण के सिद्धांत पर अपनी जात को छिपा कर काम करते हैं या कह सकते है अपने को सवर्ण में आत्म सात करके काम करते है कुछ भी सही पर लोगों को रोजगार तो मिलता है
५-अगर निजी छेत्रों में आरक्छण लागू होगा तो नौकरियां योग्यता कि जगह जाति प्रमाण पत्रों को देख कर मिलने लगेंगी जिससे व्यापारी का तो नुक्सान होगा ही साथ में दलितों का भी बहुत बड़ा नुक्सान होगा किओंकी कोई भी आरक्छन ५० % से अधिक नहीं हो सकता है जबकि उनकी संख्या ८५ % से भी जादा है अगर हम ५० % भी आरक्छन देंगे तब भी ३५ % दलित लोग नौकरी पाने से बंचित हो जायेंगे उनकी जगह सवर्ण आ जायेंगे सीधे २ ३५ % नौकरिओं का नुक्सान।
६- आज अगर कोई दलित दयनीय अवस्था में है और उसके पास कोई फर्म है अगर बांह पर सवर्णो का बोल बाला हो तब वो दलित कर्ण के नियम पर अपने को सवर्ण बता कर काम प् सकता है और अपनी सुधार सकता है परन्तु जब आरक्छण लागू हो जायेगा तब तो वो चाह कर भी रोजगार नहीं प् पायेगा अगर उस कंपनी का आरक्छण कोटा भरा हो
निष्कर्ष : हम सीधे २ कह सकते हैं कि निजी छेत्रों में आरक्छण दलितों के हित में नहीं इतना ही नहीं यह जातिवाद को वढ़ावा भी देगा जिससे अराजकता भी फ़ैल सकती है
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