चुनाब आयोग बिना दाँतो का नाग है जो सिर्फ फुस्स फुस्स करता है डसता नही !
चुनाव आयोग एक मजाक का पात्र क्यू बन रहा है , इतना डीला और शुस्त काम होगा तो लोग तो देश द्रोही बनेंगे ही उनेह अल्गाब करने से कौन रोक सकता है .
लोग खुल कर साम्प्रदायिकता फैला रहे हैं पर चुनाव आयोग की कोई पकड दिख ही नही रही है
कोई भी नेता किसी को गाली देता है कोई कुछ भी अभद्र टिप्पणी कर सकता है परंतु आयोग का कोई नियन्त्रण नही है
देश की टॉप 1 की नेता इमाम से मिल कर साम्प्रदायिकता के नाम पर वोट मांग रही है पर चुनाव आयोग चुप है
चुनाव के समय कोबरा जैसा पत्र स्टिंग कर के माहोल खराब करना चाहता है पर आयोग चुप है
लोग जाती और धर्मा के आधार पर खुल कर वोट मांग रहीं हैं पर आयोग चुप है
लोग भड़काऔ भाषन दे रहे हैं पर आयोग चुप है
लोग धर्मा के आधार पर वोट मांग रहे हैं पर आयोग चुप है
लोग हिंसा कर रहे हैं पर आयोग चुप है
अरे भाई जब आपको कुछ करना ही नही है तो फिर आचार संहिता का हवाला क्यू दिया जाता है रही बात समझाने की या सलाह देने की तो वो काम तो मीडिया भली भांति कर ही रहा है फिर आचार सहिंता की क्या ज़रूरत है
वास्तव मे चुनाब आयोग के इसी डीले पन के करण नेताओं की भाषा इतनी अभद्र है ,
नेताओं के गलत आचरण और अभद्र भाषा के लिए सीधे 2 चुनाव आयोग ज़िम्मेदार हैं
में तो इतना ही कह सकता हून की चुनाब आयोग बिना दांतो का नाग है जो सिर्फ फुस्स फुस्स करता है किसी को डसता नही है और जब तक आयोग ढीला रहेगा यह सब होता रहेगा . इसलिए चुनाव आयोग को अति शख्त होनी की अबस्यकता है.
चुनाव आयोग एक मजाक का पात्र क्यू बन रहा है , इतना डीला और शुस्त काम होगा तो लोग तो देश द्रोही बनेंगे ही उनेह अल्गाब करने से कौन रोक सकता है .
लोग खुल कर साम्प्रदायिकता फैला रहे हैं पर चुनाव आयोग की कोई पकड दिख ही नही रही है
कोई भी नेता किसी को गाली देता है कोई कुछ भी अभद्र टिप्पणी कर सकता है परंतु आयोग का कोई नियन्त्रण नही है
देश की टॉप 1 की नेता इमाम से मिल कर साम्प्रदायिकता के नाम पर वोट मांग रही है पर चुनाव आयोग चुप है
चुनाव के समय कोबरा जैसा पत्र स्टिंग कर के माहोल खराब करना चाहता है पर आयोग चुप है
लोग जाती और धर्मा के आधार पर खुल कर वोट मांग रहीं हैं पर आयोग चुप है
लोग भड़काऔ भाषन दे रहे हैं पर आयोग चुप है
लोग धर्मा के आधार पर वोट मांग रहे हैं पर आयोग चुप है
लोग हिंसा कर रहे हैं पर आयोग चुप है
अरे भाई जब आपको कुछ करना ही नही है तो फिर आचार संहिता का हवाला क्यू दिया जाता है रही बात समझाने की या सलाह देने की तो वो काम तो मीडिया भली भांति कर ही रहा है फिर आचार सहिंता की क्या ज़रूरत है
वास्तव मे चुनाब आयोग के इसी डीले पन के करण नेताओं की भाषा इतनी अभद्र है ,
नेताओं के गलत आचरण और अभद्र भाषा के लिए सीधे 2 चुनाव आयोग ज़िम्मेदार हैं
में तो इतना ही कह सकता हून की चुनाब आयोग बिना दांतो का नाग है जो सिर्फ फुस्स फुस्स करता है किसी को डसता नही है और जब तक आयोग ढीला रहेगा यह सब होता रहेगा . इसलिए चुनाव आयोग को अति शख्त होनी की अबस्यकता है.
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